पूजा से नहीं,क़र्मों से पहचान होती

कर्मों पर ध्यान दो,यही जीवन का सार है,केवल पूजा कर लेना,कहाँ पर्याप्त आधार है।

रावण भी शिवभक्त था,करता था आराधना,फिर भी कर्मों ने लिख दी,उसके अंत की साधना।

माथे पर तिलक लगाकर,मन में कपट छिपाना क्या,मंदिर में शीश झुकाकर,किसी का दिल दुखाना क्या।

ईश्वर के दरबार में,दिखावे का मोल नहीं,जहाँ कर्मों में सच्चाई नहीं,वहाँ भक्ति का बोल नहीं।

भगवान भी साथ उसी का,जो सत्य की राह चले,जो परहित में जीता हो,जो दुख में हाथ धरे।

केवल प्रार्थनाओं से,हर पाप नहीं धुलता है,बोया जैसा बीज धरा में,फल वैसा ही मिलता है।

पूजा से बढ़कर कर्मों की,अपनी एक जुबान है,इंसान की असली पहचान,उसका नेक ईमान है।

माला फेरने से पहले,मन के मैल को धोना है,ईश्वर को पाने से पहले,इंसान अच्छा होना है।

न मंदिर की ऊँची दीवारें,न शब्दों का विस्तार,नेक कर्म ही खोलते हैं,प्रभु-प्रेम के द्वार।किशन भक्ति वही जो दया बने,सेवा बने पहचान,कर्मों में ईश्वर बसते हैं,यही जीवन का ज्ञान।

*क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र