डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

आज हस्तिनापुर में फिर से
महाभारत हो रहा है
अंतर केवल इतना है
दोनों और कौरव पुत्र खड़े हैं,
पांडू पुत्र! बेचारे हाशिये पर पड़े हैं।

भीष्म पितामह
क्या करें- क्या न करें
वह भी तो दौराहे पर खड़े हैं
उनकी वफ़ादारी सिंहासन के साथ है
जिस पर अंधे धृतराष्ट्र का राज है।

संजय धृतराष्ट्र को बता रहा है
यह सारा खेल कृष्ण ही करा रहा है।
कौरवों को आपस में लड़ा कर
कुंती को सुकून पहुँचा रहा है।

गुरु द्रोण भी आज युद्ध भूमि में नहीं हैं
वह भी सिंहासन के साथ थे
मगर दुर्योधन को उनकी वफ़ा पर शक था
बस दुशासन ने उनका हरण कर लिया।

उनका पुत्र अस्वत्थामा भी
अपनों के हाथो मारा गया
कौरवों के भीतर अंतर्द्वंध बढ़ गया है।

आज पहली बार शकुनी मामा परेशान हैं
शतरंज के पाशे कृष्ण पर मेहरबान हैं
सारा खेल उल्टा हो गया
आज महाभारत फिर से हो गया।

डॉ अ कीर्तिवर्धन
इन्डी गठबंधन
बंजर भूमि में उपवन की, तुम ही प्रणेता,
तुमसे ही घर बार, तुम घर की रचयिता।
तुम रौनक- सोनचिरैया, इस आँगन की,
तुम ही इस घर आँगन की, धर्म अध्येता।

घर की परिभाषा तुमसे ही पूरी होती,
उपवन में फूलों की चाहत पूरी होती।
रिश्तों के पौधे, लहलहाते चहुँ ओर,
घर की रौनक, बच्चों से पूरी होती।

कभी-कभी कुछ काँटे भी उग आते हैं,
खरपतवार कुछ उपवन में भर जाते हैं।
बड़े जतन से साफ़ सफाई नित करती,
फूलों पर फिर तितली भौरें दिख जाते हैं।

बच्चों को संस्कार, संस्कृति की तुम पोषक,
रिश्तों में व्यवहार, सभ्यता की तुम पोषक।
रहन सहन के ढंग, निभाना तुमने सिखलाया,
रूखी रोटी में अमृत, संतुष्टि की तुम पोषक।

सहनशीलता धरती सी, तुम धारण करती,
रीति रिवाज मर्यादाओं का, पालन करती।
तीज त्योहार पूजा पाठ, अवधारणा तुमसे,
धर्म- कर्म व्रत- अनुष्ठान, परायण करती।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन